Tuesday, 4 February 2014

पार्थ की व्यथा


पराजित, उद्वेलित, कुछ खोया सा
सूखे आंसुओ में भिगोया सा

संघर्ष के जीवन में
और जीवन के संघर्ष में

अब हारने लगा है पार्थ
कृष्ण के बिन अपनों में पराया सा

कभी खुद से कभी खुदी से
अनवरत युद्ध में थका सा

अब एक विराम की चाह है
अर्ध या पूर्ण विराम सा

पर रुकना संभव नहीं अभी शायद
हो चला है वो युद्ध बीच रोपित एक स्तम्भ सा

अभी और युद्ध है बाकी
तन को लड़ना होगा चाहे मन हो थका सा

उठो नया संचार करो
द्रवित ह्रदय में चेतना का प्रसार करो
मन को साध, एक नयी हुंकार भरो

ढाल बन के वार सहो , खड्ग से प्रहार करो
चाहे ह्रदय पहने हो केसरिये बाने सा

( केसरिया बाना मेवाड़ में आखिरी युद्ध में जाते समय पहनते थे )

Sachin 04-Feb2014

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