Tuesday, 18 February 2014

........बड़ी कशमकश में हूँ....बच्चो को क्या तालीम दूँ.........!
मुझे सिखाया गया था कुछ और ...मेरे काम आया कुछ और....!!


"सोती रात ऊंघते हुए याद दिलाती है.
 सुबह फिर निकालना है टोकरी भर उम्मीद ले कर खुद को बेचने को."

Tuesday, 4 February 2014

कुछ मुक्तक


बना के लहू एक सा भेज था उसने
हम आ के यहाँ रंग बदल लिए
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सर्द मौसम है दस्तानो में हाथ लिए फिरते है
कानो मे मफलर और जुबां पे तल्खी लिए फिरते हैं
बड़े अजीब है यहाँ के लोग
सर्द अहसास और गर्म मिजाज लिए फिरते हैं

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वो ज़हर देकर मारते तो दुनिया की नज़रों में आ जाते,
अंदाज़ ए क़त्ल तो देखो मोहब्बत करके छोड़ दिया.
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वो मंदिर भी जाता है और मस्जिद भी,
भाई परेशान आदमी का कोई धर्म नही होता....

पार्थ की व्यथा


पराजित, उद्वेलित, कुछ खोया सा
सूखे आंसुओ में भिगोया सा

संघर्ष के जीवन में
और जीवन के संघर्ष में

अब हारने लगा है पार्थ
कृष्ण के बिन अपनों में पराया सा

कभी खुद से कभी खुदी से
अनवरत युद्ध में थका सा

अब एक विराम की चाह है
अर्ध या पूर्ण विराम सा

पर रुकना संभव नहीं अभी शायद
हो चला है वो युद्ध बीच रोपित एक स्तम्भ सा

अभी और युद्ध है बाकी
तन को लड़ना होगा चाहे मन हो थका सा

उठो नया संचार करो
द्रवित ह्रदय में चेतना का प्रसार करो
मन को साध, एक नयी हुंकार भरो

ढाल बन के वार सहो , खड्ग से प्रहार करो
चाहे ह्रदय पहने हो केसरिये बाने सा

( केसरिया बाना मेवाड़ में आखिरी युद्ध में जाते समय पहनते थे )

Sachin 04-Feb2014