सब खामोश हो जाएगा
बाहर भी और भीतर भी
मुक्त हो जाऊंगा इस मेले से
इन अवराणो के झमेले से
किसी की उम्मीद का बोझ नहीं होगा
वो क्या कहेंगे ये बोध नहीं होगा
कोई शिकायत नहीं आएगी
एक शाम ऐसी आयेगी।
अस्तित्व निराकार हो जाएगा
सबकी उम्मीदों का बोझ हट जायेगा
ये दर्द खत्म हो जाएगा
खुद को साबित करना बेमानी हो जाएगा
उस दिन नींद लंबी आयेगी
एक शाम ऐसी आयेगी
उस दिन खूब दौडूंगा मैं
अपने पैरों पर, बिना सहारे
उस दिन खूब खिलखिलाऊंगा मैं
अपने मजाकों पर, बिना रुके
उस दिन खूब गाऊंगा मैं
अपने तरानों को, अपनी ही राग पर
उस दिन निर्विकार, निरंकार , निर्लेप, विरक्त और मुक्त हो जाऊंगा
एक शाम शायद ऐसी आयेगी।
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