Wednesday, 10 February 2010

After a long time .. remembering my favorite festival

भाई ये २०१० की सकरात
चलो करें सकरात की बात

लोहड़ी की आग में छोले सकने की बात
रेवाड़ी और मूंगफली के अर्दय की बात

सुंदर मुन्देरिये हो की ताल

तेरा कौन विचारा की बात


शेहेर से पतंग लेने जाने की बात
मंजे को नापती उँगलियों और तान को तोलने की बात

रात को लोहरी की आग में तन बाँधने की बात
कल किस के घर से पतंग उड़ानी है वो बात

सुबह के पहले गाने की बात
आधी रात से ही तय्यारी की बात

मंगल दारा गिलास दारा और आंखाल
किसी की कांख छोटी किसीकी कांख में बल
सद्दे और मंजे के गट्टे
चर्खियों के सही से भरने की बात

दाल की पकोडियों के बीच पतंग की तान
फीनियों के बीच गुच्छे की आफत सुलझाने की बात
एक हाथ में चरखी और दूसरी से पतंग की डोर
कहीं पे पतंग निगाहें कहीं और
पतंगों के बीच पेच लड़ने की बात

वो काटा वो मारा के आवाज़
लाउड स्पीकर के गानों की बात

कटी उंगलियाँ और मांझे की धार
वो छतों पे लड़कियों की बहार
थक कर चूर होने तक पतंग उड़ाने का चाह
लालटेन से सकरात पूरी करने की बात

इस परदेस में याद कर नम होती आँखों की बात
आओ करें सकरात की बात

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