सोचता हूँ क्या हुआ, क्या होगा
जीवन के ये झंझावत
ये रोज के झमेले
चारों ओर से घिरा हुआ
खुद को पता हूँ अकेले
इस महायुद्ध में मैं
क्या हुआ क्या होगा
कितनी लगामों को खींचता
कितने अश्वों को साधता
खुद से खुद के इस युध्ध में
हर एक दिशा में भागता
उस कृष्ण के संग बिना
क्या हुआ क्या होगा
मेरे प्रिय ही हें सामने
अपने खड़े हें पार्श्व में
कितने चक्रव्यूह हें संग में
इन सभी में खुद को झोंकता
बस यहीं मैं हूँ सोचता
क्या हुआ क्या होगा
अब हारने लगा हूँ मैं
उम्मीद भी हुई है मंद
तुणीर हो चुका है रक्त
तलवार हो गयी कुंद
सूर्य के इस ढलान पे
शाम की अजान पे
मरुतनन्द के चरण में
रख के अपने आप को
सोचता हूँ
जो होगा अच्छा होगा
नहीं होगा तो ॥
फ़िर कुछ न होगा
ना मैं रहूँगा न ये सोच
nice poem and gr8 command over the language..
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